साहिल जैसा पत्थर बनकर झेल रहा मैं लहरों को
मैं तो हूँ उस गाँव के जैसा जो रोक रहा हैं शहरों को
अमृत कहीं खो गया है अब तो विषों का बोलबाला है
इस विष की काठ मे देखो खोज रहा मैं जहरों को
कुछ इच्छाओं का अम्बर सजाया था मैंने
किसी के सपनो का घर सजाया था मैंने
ये जो बड़ी बड़ी इमारतें देख रहे हो
उनकी नींव का पत्थर सजाया था मैंने
वैसे पानी तो इन आँखों मे पहले से ही बहुत पड़ा है,
काश बरसात मे पानी की जगह रोटियां मिल जातीl
गुलों की सारी चाहतें सिमटी है भंवरों तक
फिर कभी मत कहना कि हम ही मनचले हैं




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