बरसों से जल रहा कश्मीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
घाटी के घाट-घाट का पीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
एक पेड़ गिरा था और हजारों बेगुनाह दब गए नीचे,
खुद्दार पगड़ियों का बहता नीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
कितनी आबरू लुट गई यहाँ दरिंदगी की गंदगी में,
दामिनियों का फटा चीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
दो वक्त की रोटी न मिली और सो गए भूखे पेट,
वो हर चेहरा होकर गंभीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
देश का आने वाला कल है ये जो मासूम से बच्चे उनका,
मजदूरी मे तपता नन्हा शरीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
कट जाते है सिर जाबांजो के और हुकूमत खामोश रहे,
सरहदों पर बैठा हर वीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
कवि शशि प्रकाश
संपर्क सूत्र 9799691367
घाटी के घाट-घाट का पीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
एक पेड़ गिरा था और हजारों बेगुनाह दब गए नीचे,
खुद्दार पगड़ियों का बहता नीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
कितनी आबरू लुट गई यहाँ दरिंदगी की गंदगी में,
दामिनियों का फटा चीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
दो वक्त की रोटी न मिली और सो गए भूखे पेट,
वो हर चेहरा होकर गंभीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
देश का आने वाला कल है ये जो मासूम से बच्चे उनका,
मजदूरी मे तपता नन्हा शरीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
कट जाते है सिर जाबांजो के और हुकूमत खामोश रहे,
सरहदों पर बैठा हर वीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
कवि शशि प्रकाश
संपर्क सूत्र 9799691367
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