Sunday, May 27, 2018

कभी जीते थे हम

कभी जीते थे हम, कभी हारे थे हम। 
वक्त की मार से यूं बेसहारे थे हम।।

मैं चला तो ये मंजिल भी चलने लगी। 
ये हवाएँ भी रस्ते बदलने लगी। 
तुषारों सी ठंडी जो राहें थी अब तक,
सहसा सूरज के माफिक वो जलने लगी। 
उसी सूरज में जलते, चंदा से लिपटते,
आसमान के दुलारे सितारे थे हम। 
कभी जीते थे हम.............. 

ऐ ख़ुदा! तूं ही बता ये ईबादत है क्या। 
तूं तो जानता है कि मेरी हालत है क्या। 
जिसके कदमों ने काँटों से की हो मुहब्बत,
वो क्या जाने के महलों की रंगत है क्या। 
ऐसे महलों से दूर, बनके ख़्वाहिशों का नूर,
एक भटके हुए से बंजारे थे हम। 
कभी जीते थे हम.............. 

जो समंदर था आँखों में, खाली हुआ। 
दुआओं का हर लफ्ज़ अब गाली हुआ।
हम भी साहिल की तरह दर्द लेते रहे,
और थपेड़ों का हर मंजर सवाली हुआ। 
उन थपेड़ों को सहते, दरिया संग बहते,
वो सारे के सारे किनारे थे हम। 
कभी जीते थे हम.............. 

कभी जीते थे हम, कभी हारे थे हम। 
वक्त की मार से यूं बेसहारे थे हम।।

Monday, May 21, 2018

अधूरा अधूरा सा।

मुस्कुराती घटाएँ, महकती फिजाएं।
जरा जाके उसको ये याद दिलाये।।
कि कोई तेरे बिन अधूरा अधूरा सा.........

मेरे लबों पर हर घड़ी तेरा नाम आता।
धुंधली धुंधली तेरी झलक से भी आराम आता।
मैं खड़ा दूर तेरे साये से जब भी निहारूं,
पिघलाकर दूरियों को तेरा सलाम आता।
क्यूँ शरमाए, कितना छुपाएं।
ये निगाहें, कह ना पाएं।।
कि कोई तेरे बिन अधूरा अधूरा सा.........

शहद हो कि मिश्री जैसी या गुड़ की डली हो तुम।
कहूँ तुझको खिलता गुलाब या कि कोई कली हो तुम।
तेरी नटखट नज़रों को जब पकड़ा तो ये जाना कि,
तुझ जैसा पगला हूँ मैं और मुझ जैसी पगली हो तुम।
चंदा, सितारे, कबूतर, हवाएं।
कोई तो जाए, तुझे ये बताये।
कि कोई तेरे बिन अधूरा अधूरा सा.........

मुस्कुराती घटाएँ, महकती फिजाएं।
जरा जाके उसको ये याद दिलाये।।
कि कोई तेरे बिन अधूरा अधूरा सा.........

(शशि प्रकाश)

Saturday, May 19, 2018

ओस का जो है भोर से रिश्ता

चाहे सही हो या हो गलत पर जो तुम कहो वो सही है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता अपना भी रिश्ता वही है प्रिये।।

कितने मौसम आये और आकर के ही चले गए।
अधबुझे से मेरे अरमां जाने कब कब छले गए।
मैनें हर उस चीज को चाहा जिसमे तेरा रूप दिखे,
और उस तरफ न मुड़कर देखा जिसमे तूं नहीं है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता ......................

तुझे हिचकियाँ दिलाने को एक नया तरीका ईजाद किया। 
हर साँसों में, हर धड़कन में बस तुझको ही याद किया। 
महलों के ये छप्पन भोग कहाँ सुहाते मुझको भला,
ये कान्हा तो वहीं मिलेगा जिस हांडी में दही है प्रिये। 
ओस का जो है भोर से रिश्ता ......................

बिछुड़े किसी परिंदे को ज्यों बिछुड़ी मुहब्बत मिल गयी। 
तुम मिली, ऐसे लगा जैसे के जन्नत मिल गयी। 
तेरी शिकायत के मैं बोला ना, जो तूं बोली होंठों से,
पर मैंने भी आँखों ही आँखों वही बात कही है प्रिये। 
ओस का जो है भोर से रिश्ता ......................

चाहे सही हो या हो गलत पर जो तुम कहो वो सही है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता अपना भी रिश्ता वही है प्रिये।।

(शशि प्रकाश)

अपनी तन्हाईयों में घुलकर

अपनी तन्हाईयों में घुलकर वो सभी को भूल गए l
उन्हें मौत से मुहब्बत क्या हुई जिन्दगी को भूल गए ll

पांवों में छाले, कन्धों पे बोझ औ' मुस्कुराते लब,
हाय मुफलिसी! तेरी वजह से लोग गर्मी को भूल गए ll

रात भर बैठे रहे हम जलते चराग के साये मे,
सुबह होते ही उस चराग की रौशनी को भूल गए ll

कहूं अहसानफरामोशी की इन्तहां इसे या कुछ और,
चंद परिंदे आसमान में उड़कर जमीं को भूल गए ll

शायद वो मुझे भुलक्कड़ इसीलिए कहती होगी,
कि उसकी मुहब्बत में हम तो हमीं को भूल गए ll

(शशि प्रकाश)

Sunday, August 14, 2016

मत हार तूं

मत हार तूं
चला पतवार तूं 
ओ मांझी रे 
ओ साथी रे 

तीर निकला कमान से 
वापस कैसे जाएगा।
मार्ग पकड़ तूं एक बढ़ा चल 
मंजिल ऐसे पाएगा।। 
अब क्यूँ डरता है जब आया बीच मंझधार तूं, 
मत हार तूं......... 

सुख दुःख तो है 
समय का चक्का।
एक जाएगा एक आएगा 
बिना लगाए धक्का।।
दोनों में अब मेल बैठाकर आगे बढ़ एक बार तूं,
मत हार तूं......... 

चीर दे लहरों को 
ले भुजाओं का सहारा।
फिर देखूं मैं भी तुझको 
कैसे ना मिलता किनारा।।
बाधाएं दूर भागे ऐसी भर हुंकार तूं,
मत हार तूं......... 

मत हार तूं
चला पतवार तूं 
ओ मांझी रे 
ओ साथी रे 


कवि शशि प्रकाश 
संपर्क सूत्र:- 9799691367 

Wednesday, August 10, 2016

Wallpapers

साहिल जैसा पत्थर बनकर झेल रहा मैं लहरों को 
मैं तो हूँ उस गाँव के जैसा जो रोक रहा हैं शहरों को 
अमृत कहीं खो गया है अब तो विषों का बोलबाला है 
इस विष की काठ मे देखो खोज रहा मैं जहरों को 






कुछ इच्छाओं का अम्बर सजाया था मैंने 
किसी के सपनो का घर सजाया था मैंने 
ये जो बड़ी बड़ी इमारतें देख रहे हो 
उनकी नींव का पत्थर सजाया था मैंने 






वैसे पानी तो इन आँखों मे पहले से ही बहुत पड़ा है,
काश बरसात मे पानी की जगह रोटियां मिल जातीl






गुलों की सारी चाहतें सिमटी है भंवरों तक 
फिर कभी मत कहना कि हम ही मनचले हैं 


कोई ख़िताब लौटा दे

बरसों से जल रहा कश्मीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
घाटी के घाट-घाट का पीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

एक पेड़ गिरा था और हजारों बेगुनाह दब गए नीचे, 
खुद्दार पगड़ियों का बहता नीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे

कितनी आबरू लुट गई यहाँ दरिंदगी की गंदगी में,
दामिनियों का फटा चीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

दो वक्त की रोटी न मिली और सो गए भूखे पेट,
वो हर चेहरा होकर गंभीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

देश का आने वाला कल है ये जो मासूम से बच्चे उनका, 
मजदूरी मे तपता नन्हा शरीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

कट जाते है सिर जाबांजो के और हुकूमत खामोश रहे,
सरहदों पर बैठा हर वीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 


कवि शशि प्रकाश 
संपर्क सूत्र 9799691367