चाहे सही हो या हो गलत पर जो तुम कहो वो सही है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता अपना भी रिश्ता वही है प्रिये।।
कितने मौसम आये और आकर के ही चले गए।
अधबुझे से मेरे अरमां जाने कब कब छले गए।
मैनें हर उस चीज को चाहा जिसमे तेरा रूप दिखे,
और उस तरफ न मुड़कर देखा जिसमे तूं नहीं है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता ......................
तुझे हिचकियाँ दिलाने को एक नया तरीका ईजाद किया।
हर साँसों में, हर धड़कन में बस तुझको ही याद किया।
महलों के ये छप्पन भोग कहाँ सुहाते मुझको भला,
ये कान्हा तो वहीं मिलेगा जिस हांडी में दही है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता ......................
बिछुड़े किसी परिंदे को ज्यों बिछुड़ी मुहब्बत मिल गयी।
तुम मिली, ऐसे लगा जैसे के जन्नत मिल गयी।
तेरी शिकायत के मैं बोला ना, जो तूं बोली होंठों से,
पर मैंने भी आँखों ही आँखों वही बात कही है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता ......................
चाहे सही हो या हो गलत पर जो तुम कहो वो सही है प्रिये।
ओस का जो है भोर से रिश्ता अपना भी रिश्ता वही है प्रिये।।
(शशि प्रकाश)
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