Sunday, August 14, 2016

मत हार तूं

मत हार तूं
चला पतवार तूं 
ओ मांझी रे 
ओ साथी रे 

तीर निकला कमान से 
वापस कैसे जाएगा।
मार्ग पकड़ तूं एक बढ़ा चल 
मंजिल ऐसे पाएगा।। 
अब क्यूँ डरता है जब आया बीच मंझधार तूं, 
मत हार तूं......... 

सुख दुःख तो है 
समय का चक्का।
एक जाएगा एक आएगा 
बिना लगाए धक्का।।
दोनों में अब मेल बैठाकर आगे बढ़ एक बार तूं,
मत हार तूं......... 

चीर दे लहरों को 
ले भुजाओं का सहारा।
फिर देखूं मैं भी तुझको 
कैसे ना मिलता किनारा।।
बाधाएं दूर भागे ऐसी भर हुंकार तूं,
मत हार तूं......... 

मत हार तूं
चला पतवार तूं 
ओ मांझी रे 
ओ साथी रे 


कवि शशि प्रकाश 
संपर्क सूत्र:- 9799691367 

Wednesday, August 10, 2016

Wallpapers

साहिल जैसा पत्थर बनकर झेल रहा मैं लहरों को 
मैं तो हूँ उस गाँव के जैसा जो रोक रहा हैं शहरों को 
अमृत कहीं खो गया है अब तो विषों का बोलबाला है 
इस विष की काठ मे देखो खोज रहा मैं जहरों को 






कुछ इच्छाओं का अम्बर सजाया था मैंने 
किसी के सपनो का घर सजाया था मैंने 
ये जो बड़ी बड़ी इमारतें देख रहे हो 
उनकी नींव का पत्थर सजाया था मैंने 






वैसे पानी तो इन आँखों मे पहले से ही बहुत पड़ा है,
काश बरसात मे पानी की जगह रोटियां मिल जातीl






गुलों की सारी चाहतें सिमटी है भंवरों तक 
फिर कभी मत कहना कि हम ही मनचले हैं 


कोई ख़िताब लौटा दे

बरसों से जल रहा कश्मीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे
घाटी के घाट-घाट का पीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

एक पेड़ गिरा था और हजारों बेगुनाह दब गए नीचे, 
खुद्दार पगड़ियों का बहता नीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे

कितनी आबरू लुट गई यहाँ दरिंदगी की गंदगी में,
दामिनियों का फटा चीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

दो वक्त की रोटी न मिली और सो गए भूखे पेट,
वो हर चेहरा होकर गंभीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

देश का आने वाला कल है ये जो मासूम से बच्चे उनका, 
मजदूरी मे तपता नन्हा शरीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 

कट जाते है सिर जाबांजो के और हुकूमत खामोश रहे,
सरहदों पर बैठा हर वीर कहता, कोई ख़िताब लौटा दे 


कवि शशि प्रकाश 
संपर्क सूत्र 9799691367

Tuesday, August 2, 2016

ग़ज़ल

ये हिंदुस्तान है जहाँ दुश्मन मे भी यार देखा जाता हैI 
और नाख़ून काटने से पहले भी वार देखा जाता हैI

यहाँ एक दो के मरने से हमला वीभत्स नहीं होता, 
पैमाने के तौर पर लाशों का अम्बार देखा जाता हैI 

दफ्तरों मे तुम्हारी बात का वजन देखने वाला कोई नहीं है, 
वहाँ तुम्हारे कागजों पर रखा कागजों का भार देखा जाता हैI 

वतन पर खून बहाने से पीछे हटने वालो को भी, 
मजहब के नाम पर खून बहाने को तैयार देखा जाता हैI 

हमे अपनी आँखों पर अब भरोसा कम ही रहा, 
जो कुछ दिखाया जाता है वही हर बार देखा जाता हैI 

मेरी आँखों की दुनिया अब तुम्ही तक सिमट गयी, 
जिन आँखों से अक्सर ये संसार देखा जाता हैI 


कवि शशि प्रकाश 
संपर्क सूत्र 9799691367

Monday, August 1, 2016

आजादी

हमको चाहिए आजादी, ये देश मांगे आजादी 
चंद है मौकापरस्त और शेष मांगे आजादी 

घुट घुट कर जीने वाले हर क्षण से आजादी 
जातिवाद बढ़ाने वाले आरक्षण से आजादी 

बहुत बरता संयम अब गिन गिन के लेंगे आजादी 
जो तुम न दोगे आजादी तो छीन के लेंगे आजादी 

ये आवाज केवल मेरी नहीं यह बोले गली मोहल्ला 
आरक्षण तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह 

योग्यता खूंटे से बाँधी निकम्मे बने परिन्दा है 
'प्रतिभा' हम शर्मिन्दा है तेरे कातिल जिन्दा है 

गले पर छुरी हो या न हो हम बोलेंगे राम रहीम 
पर संविधान में नहीं लिखा कि बोलो 'जय भीम'

कलम तू संघर्ष कर ये जनता तेरी आभारी रहेगी 
वरना आरक्षण से आजादी तक ये जंग जारी रहेगी 

ये कोई देशविरोधी नहीं, ये राष्ट्रहितैषी नारे है 
बर्फ की सिल्ली से निकले ये धधकते अंगारे है 

त्यागो इस सीढ़ी को और सफल बनो तुम कर्म से 
भारत हमारी जाति है, हम भारतीय है धर्म से 

मोदीजी अनुरोध मेरा जल्दी करो कोई फैसला 
जातिगत ठेकेदारो को हटाओ हार्दिक हो या बैंसला 

सोचा अब कुछ परिवर्तन होगा जब तुम विजेता बन गए 
किन्तु तुम भी राजनीति के कीचड़ में पक्के नेता बन गए 

वोटबैंक के दलदल में तुम भी ऐसे धंस गए 
मंडल और कमंडल में तुम भी कैसे फंस गए 

इस तरह से प्रतिभाओं का तोड़ो मत विश्वास 
या फिर बदलो अपना नारा सबका साथ कुछ का विकास 

जो नहीं मिली आजादी हमको तो प्रतिभा का पलायन होगा 
स्वाद निकल जाएगा भोजन से हाथ मे केवल अजवायन होगा 

देश के इन सपूतों से विदेशों में विकास का सागर बहता रहेगा 
और आरक्षण से बने इंजिनीयरों का बनाया हर पुल ढहता रहेगा 

आरक्षण एक रास्ता जिसकी मंजिल देश की बर्बादी 
अब तो कहना मानो हमें लौटा दो हमारी आजादी 


कवि शशि प्रकाश 
संपर्क सूत्र 9799691367