भाग भाग तेरी साँस न फूली
तू अपना कर्तव्य न भूली
हवा से बातें करती दौड़े
एक पल भी तू तो थमती नहीं
गंगा रूकती नहीं
गंगा थकती नहीं
साँझ सवेरे हर मौसम में
पाप समेटे अपने आँचल में
कितने पेड़ों और शाखों को
कितनी लाशों की राखों को
सुरसरिता ने संभाला है
फिर पावक सी क्यों धधकती नहीं
गंगा थकती नहीं
पवित्रता की मूरत हो तुम
मानवता की जरूरत हो तुम
वाजि जैसी चाल है तेरी
सर्दी मे निदाघ है तेरी
इतनी सर्द हवाओं मे भी
तू क्यों फिर तो जमती नहीं
गंगा थकती नहीं
हमने बचपन से सुना है
तेरे जल मे सुधा है
मेरी बात सुन अलकनंदा
तेरा क्यूं है अमृत गंदा
दर्जा दिया जिसने मैय्या का
वो दुनिया साफ़ तुझे रखती नहीं
गंगा थकती नहीं
भाग भाग तेरी साँस न फूली
तू अपना कर्तव्य न भूली
हवा से बातें करती दौड़े
एक पल भी तू तो थमती नहीं
गंगा रूकती नहीं
गंगा थकती नहीं
कवि शशि प्रकाश
संपर्क सूत्र 9799691367
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