Tuesday, July 26, 2016

मुक्तक

साहिल जैसा पत्थर बनकर झेल रहा मैं लहरों को I
मैं तो हूँ उस गाँव के जैसा जो रोक रहा है शहरों को I
अमृत कहीँ खो गया है अब तो विषो का बोलबाला है,
इस विष की काठ मे देखो खोज रहा मैं जहरों को I

टुकड़े टुकड़े हो गए दिल के जीऊं मैं कैसे इतना बता I

क्या हुई है गलती मुझसे हुई मुझसे कैसी खता I
भुलवा दे सारे बीते मंजर भुलवा दे सारे गमो को,
इतना रहम करना मुझपे तूं मौला करना इतनी अता I

रावण और कंस मे मंजूर कौन है I

यहाँ सब कोयले, कोहिनूर कौन है I
गुनाह किसने किया बस यही जानना है तुम्हे, 
मुझे परवाह इसकी कि बेकसूर कौन हैI 

अपने रूह के हर कतरे को इस मिट्टी की महक से तोल दो I

जब हिन्द की शान मे चले पुरवाई तो दिल का हर द्धार खोल दो I
गर्दन पर रखी छूरी से भी जब न कह सको भारत माता की जय, 
तो दिल से नफरत की छूरी हटाकर भारत अम्मी की जय बोल दो I

मैं राही बन जाता हूँ तुम मंजिल हो जाओ I

मेरे गीत और ग़ज़लों की तुम महफ़िल हो जाओ I
आसानी से पा लू तुझे तो कैसी वो फिर प्रेम कहानी, 
एक काम करो तुम मेरी खातिर थोड़ा मुश्किल हो जाओ I

कवि शशि प्रकाश 

संपर्क सूत्र 9799691367

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